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मानव

मानव

जब जन्मा था तब मैं एक था।
बड़े होने के साथ मेरे टुकड़े होते गए
या शायद मैने खुद को टुकड़े-टुकड़े कर डाला।
हरेक दुनिया अपने मे एक था।
आश्चर्य ! फिर भी सब एक साथ जुड़े थे।
जहां भी जाता था सब साथ चलते थे।
सभी की अपनी आकांक्षाएं थीं।
सभी मुझसे और ज्यादा मांग रहे थे।
इतना ही नहीं,
इन सबों के बीच लड़ाई भी होती थी
और इन सबों की लड़ाई में मैं मारा गया।
आज भी मैं उन सबों को लड़ते हुए चुपचाप देखता रहा हूं
वह आत्मा, वह शरीर, वे ज्ञानेन्द्रियां, वे कर्मेंन्द्रियां
काश! सब एक हो मुझे पुनरूज्जिवित करतीं।

अगस्त, २०००

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