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छप्पर का छेद

छप्पर का छेद

छप्पर के एक छेद से
आती अस्ताचल सूरज की
गोल मटोल सी एक किरण
एक प्रकाश का ठप्पा
सारी दुनिया जैसे उसमें समायी है
देखो वो बादल जा रहे हैं
पीछे चिडिया जा रही हैं
आंख मिचौनी का खेल चल रहा है
अभी बादल था अभी गायब हो गया
कुछ देर के लिए
सुन-सान, विरान हो गई दुनिया
फिर कुछ पंछी आए, पीछे बादल आए
दोनो साथ मिलकर खेले
और दुनिया फिर से रंग-बिरंगी
ठप्पा वह उपर उठ रहा
शायद दुनिया भी साथ है
खेल वह अब भी चल रहा
बादल पंछी अब भी छुआ-छुई का आनंद ले रहे
बेखबर अपनी दुनिया के उपर उठने से
देखते देखते ओझल हो गया वह ठप्पा
वह दुनिया न रही, न वह बादल, न पंछी

बैठा इंतजार कर रहा एक
शायद कल भी वो दुनिया
इसी जगह फिर से आए

४ जनवरी, २०००

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